Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
एवंरूपश्च सुमते जीवो यातः शरीरताम् ।
नेत्रादिना घटाद्यन्तर्यथा वेत्ति तथा श्रृणु ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
"कथं घटादिबाह्यत्वमिन्द्रियाणि जडान्यपि” यह जो प्रश्न श्रीरामचन्द्रजी ने पूछा था, उसका
सामान्यतः समाधान हो जाने पर भी विशेषरूप से समाधान करते हैं।
सुमते श्रीरामजी, शरीररूपता को प्राप्त हुआ उक्त-स्वरूप यह जीव नेत्र आदि द्वारा घटादि बाह्य
विषयों का जिस रीति से भीतर अनुभव करता हे, वह रीति (आप) सुनिए