Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
निघृष्टनवरत्नाभे यदा नयनतारके ।
तदा तयोर्बाह्यगतः पदार्थः प्रतिबिम्बति ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से भले ही घट में ज्ञानरूप फल की उपपत्ति हो जाय, फिर भी हृदय के अन्दर घटाकार
का प्रवेश कैसे होगा ? इस पर कहते हैं।
आवरण आदि दोषों से शून्य होने के कारण जब आँखों के तारे, सान पर घिसे गये नवीन नीलम-
मणि की नाई, चमकते रहते हैं तब उनमें घटादिप्रतिविम्बयुक्त चित्तवृत्ति प्रवेश करती है, इसीसे बाहर-
स्थित घटादि पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है, यह कहा जाता है