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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

जीवेन भवति श्लिष्टः प्रतिबिम्बतया ततः । जीवज्ञेयत्वमायाति बाह्यं वस्त्विति राघव ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीराघव, तदनन्तर उस प्रकार आँखों के तारों में प्रविष्ट हुआ घटादि पदार्थ, हृदय में प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण अहमभिमानी जीव के साथ संयुक्त हो जाता है। इस रीति से बाहर ही भासमान घटादि बाह्म-वस्तु अहंकारी जीव द्वारा हृदय में ज्ेय हो जाती है