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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अत्यन्तजडयोरेव जीवयोरिव तन्मिथः । प्रतिबिम्बं दृशो भ्रान्ति विद्धि वेद्यविदां वर ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

चैतन्य-प्रतिबिम्बभूत व्यष्टि-समष्टि रूप जीवों का भरान्तिमात्र से सिद्ध हुआ बिम्बातिरिक्त स्वरूप विम्ब के सत्य होने पर भी जब हम नहीं कह सकते, तब अत्यन्त जडस्वरूप मुख एवं दर्पण का या घट एवं चित्तवृत्तियों का परस्परसापेक्ष प्रतिबिम्बस्वरूप हम कह नहीं सकते-इसमें तो कहना ही क्या ? इस आशय से महाराज वसिष्ठजी उत्तर देते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : तत्त्वज्ञानियों में श्रेष्ठ श्रीरामजी, जिस प्रकार चिति के प्रतिबिम्बस्वरूप समष्टि-व्यष्टयात्मक जीवों का स्वरूप बिम्बभूत चित्‌ के सत्य होने पर भी चैतन्यात्मा की भ्रान्ति है, उसी प्रकार अत्यन्त जडस्वरूप मुख एवं दर्पण का या घट एवं चित्तवृत्ति का परस्परसापेक्ष प्रतिबिम्ब भी चैतन्यात्मा की भ्रान्ति ही हे, यह आप जानिए