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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

तावन्मात्रं जगत्त्वेतद्विश्वासो मा तवास्त्विह । अहमित्यादिस्तरङ्गो वर्तमानं सदा जलम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल प्रतिबिम्ब ही भ्रान्ति नहीं है, कितु जगत्‌ भी भान्ति है, यह कहते हैं। श्रीरामजी, यह जगत्‌ भी भ्रान्तिमात्र ही ह, इसलिए आपको इस जगत्‌ में विश्वास नहीं करना चाहिए। यह अहंकार आदि प्रपंच एक तरह से तरंग स्थानीय है, अतः चिति-जल से पृथक्‌ उसकी सत्ता कभी नहीं हो सकती; सत्तावान्‌ तो सर्वदा चिति जल ही है