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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

कथं घटादिबाह्यत्वमिन्द्रियाणि जडान्यपि । शरीरेऽनुभवन्त्यन्तःपुनर्नानुभवन्त्यपि ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

महर्षे, जडस्वरूप भी ये इन्द्र्यो शरीर के भीतर घटादि बाह्य पदार्थो का अनुभव कैसे करती हैं और पुनः अनुभव क्यों नहीं करतीं ? तात्पर्य यह है कि यदि कोई कहे कि चक्षु आदि इन्द्र्यो स्वयं बाहर निकलकर घट आदि की बाह्यता का अनुभव कर तदनन्तर भीतर प्रवेश कर फिर उन्हें कहती हैं तो इस पर यही समाधान है कि उनमें (इन्द्रियो मे) न पृथक्‌ चैतन्य है ओर न कहने की सामर्थ्य ही है, अतः आपका कथन असंगत ही है । इसी प्रकार यदि कोई यह भी कहे कि वे इन्द्रियाँ ही हृदय में बाह्यार्थों को लाकर स्थापित करती हैं तो इस पर भी यही समाधान है कि हृदय में बाहार्थो का स्थापन हो जाने पर तो पुनः पुनः उनका (घटादि बाह्यार्थो का) अनुभव होने लगेगा, क्योकि फिर उनका (घटादि बाह्यार्थो का) बाहर निकलना नहीं देखा जाता