Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अयःशलाकोपमयोर्घटादीन्द्रिययोः किल ।
अश्लिष्टयोरन्तरसौ कथं तन्नोदिता मिथः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस पर शंका हो कि पहले घट आदि बाह्य विषय चक्षु आदि इन्द्रियो को अपने प्रदेश में खिंचते हैं।
बाद में खिची गयी वे इन्द्रियाँ अपने विषयों को बोधकर हृदय स्थित भोक्ता के लिए किसी अंशविशेष से
भीतर ऐसे लाती हैं, जैसे प्राणेन्धरिय गन्ध को, यो कल्पना करेगे तो इस पर कहते है ।
भिन्न-भिन्न प्रदेश में गड़ी हुई दो लोह-शलाकाओं की नाई परस्पर अत्यंत असम्बद्ध (न मिले
हुए) घटादि विषय एवं इन्द्रियों की आपसे कही जा रही परस्पर आकर्षणशीलता ओर उसमें भी नेत्र
आदि अल्प विवरों के भीतर घट आदि स्थूल पदार्थो का प्रवेश होना, यह केसे ? यानी सर्वानुभवविरुद्ध
हे । तात्पर्य यह है कि इन्द्रियों के साथ संश्लिष्ट होकर ही विषय उनका (इन्द्रियों का) आकर्षण कर
सकते हैं, असंश्लिष्ट होकर नहीं; क्योकि घट आदिसे असंश्लिष्ट रज्जु कभी उनका (घटादि का)
आकर्षण करती हुई दिखाई नहीं पडती । ओर गोलक प्रदेशों के समीप न जानेवाले घटादि का उनसे
सम्बन्ध भी नहीं हो सकता तथा न तो रज्जु की नाई इन्द्र्यो घट आदि का संश्लेष या आकर्षण
करती हैं - यह प्रसिद्ध ही है; क्योकि भिन्न-भिन्न प्रदेशों मे गडी हुई दो लोह-शलाकाओं की नाई
वे दोनों भिन्न देशस्थ हैं