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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इन्द्रियाद्यपि चित्तादि घटाद्यपि न किंचन । पृथक् संभवतीहाङ्ग निर्मलाच्चेतनादृते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह आप बहुत ही थोड़ा कहते हैं कि गोलको से भिन्न दूसरी इन्द्रियाँ नहीं है; क्योकि वास्तविक विचार करने पर तो चिति से भिन्न प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेयो का कोई भी विभाग किसी वादियो द्वारा निरूपित नहीं हो सकता, इस आशय से महर्षि विष्ठजी पहले समाधान करते है । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इस व्यवहार-भूमि में निर्मल चिति के सिवा इन्द्रिय आदि भी, चित्त आदि ओर घट आदि किसी भी अन्य पदार्थ का पृथक्‌ संभव नहीं हे