Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
न पुनर्भवतः पूर्वं संपन्नाश्चक्षुरादयः ।
यथा कमलजस्यैतत्सर्वमेव त्वया श्रुतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
र्व मे असत् अहंकार, देह, इन्द्रिय आदि की कल्पना, जैसे जीवसमष्टिरूप हिरण्यगर्भ की है,
वैसे ही व्यष्टिरूप आपकी भी है“ ऐसा -कलनोन्मुखतां यातम्“ इत्यादि से वर्णित तात्पर्य आपने जान ही
लिया, यो आगे कहे जानेवाले विषय के उपोद्घात के लिए अनुवाद करते हैँ ।
महराज वशिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, कमलजन्मा हिरण्यगर्भ की नाई सृष्टि के पहले *अनाद्यन्तम्
इस श्लोक से कहे गये ब्रह्मस्वभाव में स्थित आपके भी चक्षु आदि उत्पन्न नहीं हुए थे, यह सब मेरे
कथन का तात्पर्य आपने जान ही लिया है
सर्ग सन्दर्भ
पवासर्वँ सर्ग समाप्त इक्यावनवाँ सर्गं अज्ञानवश ही जीव, इन्द्रिय, मन, देह पुर्यष्टक आदि भ्रम उत्पन्न होते हैँ, तत्त्वज्ञान होने पर तो एकमात्र ब्रह्म ही रह जाता है -यह वर्णन ।