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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मपुर्यष्टकस्यादावर्थसंविद्यथोदिता । पुर्यष्टकस्य सर्वस्य तथैवोदेति सर्वदा ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार पुर्यष्टक की कल्पना के अनन्तर व्यवहार योग्य अर्थो की कल्पना भी जैसे समष्टि की है, वैसे ही व्यष्टियों की भी है, यह कहते है। जिस प्रकार हिरण्यगर्भात्मक समष्टिपुर्यष्टक का सर्ग के आदि में व्यवहार योग्य अर्थ -ज्ञान उदित होता है, उसी प्रकार सभी व्यष्टिपुर्यष्टकों का भी अर्थज्ञान सर्वदा उदित होता है