Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
आलोकितं नाम कथमवस्तु किल लभ्यते ।
प्रयत्नेनापि संप्राप्तं मृगतृष्णाम्बुकैरिव ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, (हम यह मानते हैं कि) मृगतृष्णा जल दिखाई दिया, पर उसे प्रयत्न से भी किन्हीं लोगों ने
कहीं पाया क्या ? अर्थात् किसी ने कहीं नहीं पाया; ठीक इसी प्रकार (मृगतृष्णाजल के सदृश) जो
अवस्तुभूत पदार्थ हैं, भ्रान्तिवश देखे गये भी वे किस तरह पाये जा सकते हैं ? वास्तव में तो दृष्टान्तभूत
मृगतृष्णाजल भी अप्रसिद्ध है, यह भाव हे