Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
इदमन्तरिदं बाह्यमिति निश्चयवांस्ततः ।
जीवो भावं यथादत्ते तत्तथा द्रढयत्यथ ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर यह जीव, जिसे “ये इन्द्रिय,
मन, प्राण आदि आन्तर पदार्थ हैं और ये घट आदि बाह्य पदार्थ है" यों निश्चय हो चुका है, जिसकी
जैसी वासना कर लेता है, उसे वैसी ही यानी उसी रूप से दृढ़ कर लेता है