Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
रश्मिजालमिवेन्दोर्यदात्मनः प्रतिभासनम् ।
बाह्यस्पर्शतया तेन तदेवाशूररीकृतम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ विषय एवं इन्द्रिय के सन्निकर्षं से अभिव्यक्त स्वात्ससुख की ही विषयसुख के रूप से वह
कल्पना करता है, यह कहते हैं।
चन्द्रमा की किरणों की नाई आत्मा का जो सुखरूप से ज्ञान होता है, उसे ही इस जीव ने बाह्य
विषयों के सुखानुभवरूप से शीघ्र स्वीकार कर लिया है