Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
मरिचस्येव यत्तैक्ष्ण्यं शून्यत्वमिव खस्य यत् ।
आत्मनो वेदनं यच्च तदेवान्यदिव स्थितम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी प्रकार वह स्वाभाविक आत्म-वेदन ही विषयसन्निकर्ष से अभिव्यक्त अहमाकार आत्मा का
धर्म है, ऐसी भावना कर लेता है, यह कहते हैं।
मिर्च से अभिन्न मिर्च की प्रसिद्ध जो तीक्ष्णता है ओर आकाश से अभिन्न आकाश की प्रसिद्ध जो
शून्यता है, इन दोनों के सदुश आत्मा से अभिन्न प्रसिद्ध जो आत्मा का ज्ञान है, वही अन्य-सा होकर
स्थित है यानी स्वाभाविक आत्मज्ञान ही अज्ञानवश भिन्न-सा अहमाकार आत्मा का धर्म बनकर स्थित
है