Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्वभावेतरनामासौ स्वसंकल्पमयात्मकः ।
कश्चित्कदाचिद्भवति स्वभावेनैव नान्यथा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, (उन दोनों प्रवृत्ति नियमों में एक तो स्वाभाविक राग
आदि दोषों से जनित है और दूसरा शास्त्रजनित है। उक्त दोनों प्रकारों के भी ये नियम संकल्परूप हैं।)
उन दोनों मे से कदाचित् कोई एक ही स्वाभाविक पुरुषप्रयत्न से ही दूसरे को जीतकर होता है, अन्यथा
नहीं, यह भाव है