Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
चित्त्वजाड्यात्मकं चित्तं दृष्टं भावयति स्वयम् ।
यथा यदैव यद्भावं तथा भवति तत्तदा ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
चेतन और जडस्वरूप (८) यह चित्त स्वयं जब भी जिस किसी पदार्थ
(८) कहीं-कहीं “चित्तजाड्यात्मकम्” ऐसा भी पाठ मिला है । उसके अनुसार चित्त का जाड्य
यानी “जडदेहविषयाकार, तत्स्वरूप“ यह अर्थ समझना चाहिए |
की जिस प्रकार दृढ़ भावना करता है, यानी जभी देव, नर, स्थावर आदिरूप से देवादि के स्वरूप की
भावना करता हे, तभी उस प्रकार का वह हो जाता हे