Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
सर्वगत्वाच्चितेश्चित्त्वं नित्यं मनसि विद्यते ।
हेमत्वं कटकस्येव जडभावः स्थितोऽन्यदा ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए उसके प्रथम कार्यभूत मन में चिद्रूपता तथा जडता-ये दोनो दिखाई पड़ती हैँ । उनमें जो
नित्य है, वही सत्य है, यह कहते हैं।
जिस प्रकार कटक में नित्य ही सुवर्णरूपता रहती है, उसी प्रकार चिति के सर्वव्यापी होने से उसके
सर्वप्रथम कार्य मन में सर्वदा चितिरूपता रहती है । ओर जडरूपता तो किसी समय यानी अध्यास
समय में विद्यमान रहती हे