Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
चितः स्वकलनात्तस्य देहोग्र इव तिष्ठति ।
पञ्चात्माभावितोऽसत्यो महायक्षः शिशोरिव ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
मोक्ष के बिना देहादि की निवृत्ति क्यो नहीं होती ? इस शंका पर कहते हैं।
चूँकि जब तक मोक्ष नहीं हो जाता तब तक इस चिति की अपनी देहाकार की कल्पना करनेवाली
वासना सदा बनी ही रहती है, इसलिए इस जीव की अपनी वासना ही पांचभौतिक देह होकर उस प्रकार
आगे खडी हुई-सी रहती है; जिस प्रकार बालक के आगे कल्पित असत्य महायक्ष खड़ा हुआ-सा रहता
है, (अतः मोक्ष के बिना देहादि की निवृत्ति नहीं हो सकती)