Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
अमूर्त एव चित्तात्मा खत्वमस्यातिपीनता ।
वाततास्य महागुल्मो देहतास्य सुमेरुता ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शका हो कि शास्त्रों में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, प्राण, पचमहाभूत, अन्तःकरण, अविद्या, काम
और कर्मा-इन्हे पुर्यष्टक कहा गया है, वह पंचीकृत आकाश, वायु आदि लिगघटित स्थूलान्त मूर्तरूप
भी होगा । ऐसी स्थिति में आपने अमूर्त मन, बुद्धि आदि आठें का समूह ही 'ुर्यष्टक” है, यह कैसे
कहा ? तो इस पर कहते हैं।
आप द्वारा कथित मूर्तरूप पुर्यष्टक तब होगा जब पंचीकरण से अमूर्तरूप तन्मात्राओं की स्थूलता
होगी । यह सूक्ष्मतन्मात्रस्वरूप लिंगात्मा तो अमूर्त ही हे । इसकी पंचीकृत आकाशरूपता, जो कि
निरवधि स्थूल है, नहीं हो सकती, करोड़ों अमूर्त वासनाओं को मिलाने पर भी कहीं स्थूलता नहीं
दिखाई पड़ती । जब इस पुर्यष्टक की आकाशरूपता ही दुर्लभ है तब उसकी स्थूल वायुरूपता बड़ी-
बड़ी तनोंवाले वृक्ष की नाई अत्यन्त ही असंभावित है । एवं जब स्थूलभूतों का ही उसमें (पुर्यष्टक में)
संभव नहीं है तब इसकी देहता उस प्रकार अत्यन्त असंभावित है, जिस प्रकार अतिसूक्ष्म परमाणु की
सुमेरुता। अतः यह नहीं कह सकते कि भौतिक देह तक ही पुर्यष्टक हे, यह भाव हे