Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verses 52–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 52,53
संस्कृत श्लोक
विरजस्त्वक्रमेणैव निरवस्थस्तु मुक्तिभाक् ।
सुषुप्ततैकावस्थास्य जडाः क्रोडीकृता यया ॥ ५२ ॥
स्वप्ननाम्नी तथावस्था देहप्रत्ययशालिनी ।
आमोक्षं भ्रमतीहायमिति स्थावरजंगमैः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
मुक्ति मे अनुपयोगी होने से भी इस मोक्षशास्त्र मे स्थूल पदार्थों के अस्तित्व की कल्पना युक्त नहीं
है, इस आशय से कहते है।
यदि यह देहादि प्रपंच मनोमात्र ही हे यानी एक कल्पना ही है तो वैराग्य आदि के अभ्यास से-उसे
(मन को) राग-द्वेषशून्य कर देने पर यह जीव शमादि-साधन चतुष्टय से सम्पन्न हो जाता है । तदनन्तर
महावाक्यों द्वारा ज्ञानोदयक्रम से मनःकल्पित स्वप्नप्राय प्रपंच ओर उसकी मूलभूत अविद्या का बाध हो
जाने पर-अपनी कार्य एवं कारणस्वरूप अवस्थात्मक दोनों बन्धो से शून्य जीव को मुक्ति प्राप्त होती
है । स्थूलभूत भौतिक मूर्तप्रपंच की भी सत्ता मानने पर तो उस प्रकार के प्रपंच का ज्ञान से बाध दिखाई
न पडने पर मुक्ति हो नहीं सकती। (एवं निष्कर्ष यही निकला कि स्वप्न ओर सुषुप्ति-ये दो ही अवस्थाएँ
हैं, जाग्रतनामक स्थूलविषयिणी दूसरी अन्य कोई अवस्था किसीसे सिद्ध नहीं की जा सकती, इस
आशय से उन्हीं दोनों का विभागकर दिखलाते हैँ।) जिसने जडस्वरूप देहादि सब प्रपंच को वासनारूप
से उपसंहार कर गोद में कर लिया है, वह जीव की सुषुप्तता यानी सुषुप्तिनामक एक अवस्था हे, ओर
देहप्रतीति से समन्वित स्वप्ननाम की दूसरी अवस्था ह । इस तरह दिखाई दे रहे प्रकारो से स्थावर एवं
जंगम आकारो से यह आतिवाहिक देह ही मोक्ष-प्राप्तिपर्यन्त इस संसार में घूमती रहती है