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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

जीवप्रबोधान्मुक्तिर्हि प्रबोधात्परमात्मताम् । सोऽभ्येति क्षालितमलं ताम्रं कनकतामिव ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव की तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है ओर उसी तत्त्वज्ञान से वह वैसे परमात्मस्वरूपता को प्राप्त हो जाता है, जैसे मल धो दिये जाने पर विशुद्ध हुआ ताँबा सूर्वणरूपता को प्राप्त हो जाता है