Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
जीवप्रबोधान्मुक्तिर्या सा चेह द्विविधोच्यते ।
एका जीवन्मुक्ततेति द्वितीया देहमुक्तता ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामभद्र,
(&) प्रस्तुत श्लोक में “च” शब्द अप्यर्थक है यानी उसका “भी” यह अर्थ है । एवंच, कल्पवृक्षो
में पुण्य के आधिक्य से कृमि, कीट, क्षुधा, तृषा आदि दुःखों के न होने से यद्यपि आनन्द अधिक
है; तथापि उनमें मनुष्य आदि के समान ज्ञान नहीं है, किंतु अत्यन्त तमोमयता ही है, यह भाव हे ।
जीव के तत्त्वज्ञान से जो मुक्ति प्राप्त होती है, वह शास्त्रों में दो प्रकार की बतलायी गई है ~ एक
जीवन्मुक्ति और दूसरी देहपात से होनेवाली कैवल्यमुक्ति