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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 69

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 69

संस्कृत श्लोक

तदा ग्राह्यग्रहणधीर्मृगतृष्णेव सोदया । नेह संत्यज्यते किंचिन्नेह किंचिन्न गृह्यते ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार हेय-उपादेय की विचित्रता भी वासनाध्यस्त ही है, वास्तविक नहीं, ऐसा कहते हैं। आत्मा यहाँ न किसी का त्याग करता है और न किसी का ग्रहण ही करता हे । वास्तव में आत्मा से भिन्न किसी का अस्तित्व हे ही नहीं । अतः यहाँ बाह्य और आन्तर कलाओं के आकारवाला एकमात्र चिदात्मा ही प्रकाशता है