Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
बाह्यान्तरकलाकारश्चिदात्मैकः प्रकाशते ।
त्रिजगच्चिच्चमत्कारस्त्वलं भेदविकल्पनैः ।
शोभिताः स्मश्चिति चिरात्सबाह्यान्तर्न विद्यते ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
ये तीनों जगत् चैतन्यात्मा की एक चमत्कृति ही हे । इसलिए भेदक
संकल्पो से प्रयोजन ही क्या रहा ? अब हम तत्त्वज्ञान से अपने चैतन्यस्वरूप में चिरकाल से विराजमान
हैँ । यह बाह्य-आन्तर जगत् तीनों काल में भी नहीं हे