Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 52, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
तस्याद्य यावदनघ प्रवाहपतिते निजे ।
कर्मण्यचलसंकाशस्थिरं चित्तमवस्थितम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक है ? ऐसा ही सही, पर इससे प्रकृत में क्या आया ? इस पर कहते हैं।
हे अनघ, उस यमराज का चित्त सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक प्रवाहपतित अपने अधिकार-
कर्म मे, पर्वत के सदुश अडिग होकर, ज्यों का त्यों अवस्थित है