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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 52, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

तेन नीरन्ध्रभूतौघनिःसंचारं महीतलम् । भवति प्रावृषि स्वेदी कुञ्जरो मशकैरिव ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

उस समय किसी एक भी प्राणी की हिंसा न होने के कारण यह पृथिवी वर्षा-ऋतु में मच्छरों से पसीने से तरबर हाथी के समान- अनेकविध जीवसमूहों से संचार के अयोम्य बन जाती है