Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 52, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उपदेश के प्रकार का ही विस्तार से वर्णन करते हैं।
यह अज आत्मा न तो कभी उत्पन्न होता हे ओर न कभी नष्ट ही होता हे । ((%) आदि ओर अन्त
के विकारों का निषेध करने पर प्रसक्त हुए मध्यतन चार विकारों का अथवा भाविजन्म आदि का निषेध
करते हैं।) यह न कभी जन्म पाकर पुन: अपने अस्तित्व को प्राप्त करता है ओर न कभी शरीर का खड्ग
आदि से छेदन करने पर इसका छेदन ही होता हे । यह अज, नित्य, शाश्वत और पुराण हे