Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
शान्तब्रह्मवपुर्भूत्वा कर्म ब्रह्ममयं कुरु ।
ब्रह्मार्पणसमाचारो ब्रह्मैव भवसि क्षणात् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा ब्रह्मार्पणबुद्धि से, जिसका लक्षण आगे चलकर किया जायेगा, सम्पादित हुआ वह शास्त्रीय
कर्म तुम्हारे संसार-बन्धन के लिए नहीं होगा; यह कहते हैं।
शांत ब्रह्मशरीर होकर कर्म को ब्रह्ममय कर दो । अपने सत्कर्मो को ब्रह्मार्पण कर देने पर तुम शीघ्र
ब्रह्म ही हो जाओगे