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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

ईश्वरार्पितसर्वार्थ ईश्वरात्मा निरामयः । ईश्वरः सर्वभूतात्मा भव भूषितभूतलः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

निर्विशेष ब्रह्मतत्त्व के ज्ञान से अथवा उसकी असामर्थ्य में (निर्विशेष ब्रह्म के तत्त्वज्ञान में समर्थ न होने पर) सगुण ईश्वर के प्रति कर्म-समर्पणबुद्धि से कर्म करो । उससे भी कर्मबन्ध नहीं होगा, यह कहते हैं । पार्थ, शुभ या अशुभ रूप अपने सब अर्थों को ईश्वर में समर्पित कर तथा अपनी आत्मा को भी ईश्वर में समर्पित कर निरामय (सांसारिक सुख, दुःख, राग, द्वेष, आदिरूप व्याधियों से रहित) होते हुए एवं सर्वभूतों की आत्मा बनकर इस भूतल को विभूषित करते हुए तुम ईश्वर हो जाओ