Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अभिमान-त्याग का फल कहते हैं।
वधादिप्रवृत्तिकाल में जिस पुरुष में “मे इसे मारता हूँ” यों अभिमान नहीं होता ओर उसके (वधादि
के) उत्तरकाल में जिसकी बुद्धि उसके फल हर्ष, शोक आदि से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष सम्पूर्ण
चतुर्विध भूतजातियो को मारकर भी किसी एक को भी नहीं मारता; क्योकि सर्वत्र वधादि विकारके
स्पर्शं से रहित शाश्वत एकात्मतत्त्व अविकारी ही है तथा मायामात्र होने से देह आदि के सदा असद्रूप
होने के कारण वन्ध्यापुत्र की नाई वध में उसकी प्रसक्ति नहीं है इसलिए ईश्वर के समान तत्प्रयुक्त
पापफल से भी वह निबद्ध नहीं होता, यह भाव हे