Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यैव संजायते संविदन्तः सेवानुभूयते ।
अयं सोऽहमिदं तन्म इत्यन्तः संविदं त्यज ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हन्तृत्वादि धर्मवाले देहादि में तादात्म्य-भ्रम होने से ही देह के धर्म हन्तृत्वादिका आत्मा में प्रतिभास
होता है, न कि स्वतः । अतः सबसे पहले उसीका त्यागकर दो, यह कहते है ।
हृदय-स्थित आत्मा में देहादि अभिमानरूपा या और किसी दूसरी तरह की जो ही बुद्धिवृत्ति उत्पन्न
होती हे, वही अनुभूत होती है । अतः अयम्" यानी कार्यकरणसमूह, "सोऽहम्" यानी मारनेवाला "मे",
“इदम् यानी इस देह आदि के सम्बन्धी ओर "तन्मे यानी वे बन्धु आदि मेरे हैं, इस तरह की अन्दर
उत्पन्न हुई भ्रान्तिवृत्ति का त्याग कर दो