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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अनयैव च युक्तोऽस्मि नष्टोऽस्मीति च भारत । अभितः सुखदुःखाभ्यामवशः परितप्यसे ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भारत, इसी बुद्धिवृत्ति के कारण 'मैं हन्तृत्वादि धर्मों से युक्त हू, “ “हन्तृत्वादिप्रयुक्त पापों से मैं नष्ट हूँ” तथा “अपने बन्धुओं के नाशादिरूप ऐहिक अनर्थो एवं नरकपात आदि पारलौकिक अनर्थो से मैं ग्रस्त हूँ” इत्यादि भ्रान्तियों से पराधीन होकर तुम चारों ओर सुख-दुःखों से परितप्त हो रहे हो