Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
तदुद्योगं विदुर्ज्ञानं योगं च कृतबुद्धयः ।
ब्रह्म सर्वं जगदहं चेति ब्रह्मार्पणं विदुः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माकार से परिपूर्ण चित्त की वृत्ति को, जो कि अज्ञान की निवृत्तिरूप फल से
उपहित है, परिपक्व बुद्धिवालों ने ज्ञान कहा है । और अज्ञाननिवृत्ति उपहित ब्रह्माकार के अनुकूल
प्रवाह मात्रस्वरूप चित्तवृत्ति को तो योग कहा है । (अभिमान के विषय जगत् ओर अभिमान करनेवाले
अहंकार का ब्रह्म में बाध ही मुख्य ब्रह्मार्पण है, यह कहते हैं) तथा “सम्पूर्ण संसार ब्रह्म ही है", और “मे
ब्रह्मरूप हूँ” - इस प्रकार के वाध को ब्रह्यार्पण कहा हे