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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

अन्तःशून्यं बहिःशून्यं पाषाणहृदयोपमम् । शान्तमाकाशकोशाच्छं न दृश्यं न दृशः परम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म मे जगत्‌ और अहंकार - इन दोनों के बाध की उपयन्ति के लिए उसमें अध्यस्तता कहने के लिए ब्रह्मस्वरूप कहते है । वह ब्रह्म भीतर शून्य है, बाहर भी शून्य है ओर उसकी उपमा पत्थर के हृदय से दी जा सकती हे । वह शान्तस्वरूप हे, आकाश-कोश के समान अत्यन्त स्वच्छ हे । वह दृश्यस्वरूप नहीं हे । (सम्पूर्ण दृश्यों का निषेध हो जाने पर दृश्यस्वरूप होने के कारण द्रष्टा का भी निषेध क्यों नहीं होगा ? ऐसी आशंका कर कहते हैं।) और न है द्रष्टा से अलग । द्रष्टा में दृश्यता का निषेध उस समय हो सकता, जब द्रष्टा के अतिरिक्त कोई दूसरा द्रष्टा होता, वह तो है नहीं, यह भाव है