Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
विकल्पभेदे स्फुरिते संवित्सारमयात्मनि ।
वैचित्र्येण विचित्रेपि किमेकत्वेऽपि नो ग्रहः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तत्-तत् विषयों की विचित्रता से चित्र-विचित्र होकर अहं तथा ममतादि स्वरूप सम्पूर्ण विकल्पभेदों
का स्फुरण होता है, तव उनकी सत्ता की स्फूर्ति मेँ निमित्त, तीनों अवस्थाओं में अनुगत, एकमात्र
संवित्सारस्वभाव एवं सब विकल्पों के आगम ओर अपाय में साक्षी होकर स्थित रहनेवाले प्रत्यगात्मा में
एकत्व का भी स्फुरण होता ही हे । ऐसी अवस्था में उसमें भी आग्रह करना युक्त है, फिर वह क्यों नहीं
किया जाता ?