Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
त्रैलोक्यपयसामन्तर्यो रसानुभवः स्थितः ।
गव्यानामब्धिजानां च सोऽयमात्मेति भारत ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भारत, तीनों लोकों में स्थित जलों के भीतर जो रसानुभव विद्यमान है, गऊ के
विकारस्वरूप दूध आदि के भीतर जो रसानुभव स्थित है, लवण आदि के भीतर जो रसानुभव स्थित
है तथा ईख, मधु आदि के भीतर जो रसानुभव स्थित है; वही इदंपदार्थ यानी यह आत्मा है यही
निश्चय है । तात्पर्य यह कि यों जो सबके अनुभवों का विषय होता है, उसमें तो अत्यंत परोक्षता की
प्रसक्ति ही नहीं है