Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
इमाः सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः ।
आत्मन्यहंताचित्तस्थाः पयःस्पन्दा इवाम्बुधौ ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन, ये अहमभिमानवाले चित्त मेँ रहनेवाली सृष्टि-प्रलयात्मक सब तरह
की क्रियाएँ वास्तव में आत्मा में ऐसे प्रवृत्त होती हैं, जैसे समुद्र मेँ जल की तरगादि स्पन्दन क्रियाएँ प्रवृत्त
होती हैं