Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
वक्ष्यमाण लक्षणों से युक्त उन जीवन्मुक्तो को विदेहमुक्ति भी प्राप्त होती है, इस आशय से
कहते है ।
हे पार्थ, मान और मोह से रहित, बाहर के विषयों मेँ आसक्तिशून्य, आत्मज्ञान में निरत,
विषयवासनाओं से रहित, सुख, दुःख आदि द्वन्द से निर्मुक्त तथा "अहम्" 'मम' इत्यादि भेद-प्रत्ययों
से शून्य अमूढमति महात्मा उस अविनाशी परम-पद को प्राप्त होते हैं