Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यावत्कालक्रियादेशास्त्वमहंसैनिका इव ।
ब्रह्मणीव परिस्पन्दा नात्र स्तः सदसद्भ्रमौ ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
काल, क्रिया, देश, तुम, मैं
आदि जितने पदार्थ हैं, वे सबके सब उस सम्राट् के भी सम्राट् परब्रह्म के एक तरह से सैनिक हैं,
वे सब ब्रह्मात्मा मेँ एक तरह से परिस्पन्दनरूप हैं, अत: आत्मा में भाव-अभावविकल्प हें ही नहीं