Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
कर्मण्यकर्म यः पश्यत्यकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स चोक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष, उक्त रीति से कर्म मे अकर्म देखता है यानी निष्क्रिय ब्रह्म का अवलोकन
करता है ओर अकर्म में (निष्क्रिय ब्रह्म मेँ) अविच्युत -प्रतिष्ठारूप अवश्यकर्तव्यकर्म का अवलोकन
करता है, वही मनुष्यों मेँ विवेकी पुरुष है; ओर वही स्वरूपतः तथा फलतः अशेषकर्म करनेवाला
है । इसलिए उसीको विद्वानों ने "कृत्स्नकर्मकृत् (अशेष कर्मो का कर्ता) कहा है