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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि । योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे धनंजय, प्रवृत्ति में निमित्तभूत लाभादिरूप कर्म-फल से युक्त मत होओ ओर अकर्म में यानी प्राप्त कर्म के न करने में तुम्हें आसक्ति न हो । योग में स्थित होकर (पूर्वकथित सिद्धि-असिद्ध में समदृष्टिरूपी योग में प्रतिष्ठित होकर) आसक्ति छोडकर कर्म करते चलो