Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मफलं मे आसक्ति छोडकर जो पुरुष नित्यतृप्त ओर निराश्रय होकर
स्थित रहता हे, वह कर्म में भली-भाँति प्रवृत्त हुआ भी कुछ नहीं करता