Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ते तु नैकात्मनश्चान्ये क्वाऽतो दुःखं क्व वा सुखम् ।
अनाद्यन्तेऽनवयवे कुतः पूरणखण्डने ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
(यहाँ
शीत और उष्ण शब्द दुष्टान्तार्थक हैं यानी ग्रीष्मकाल मे शीत सुखद है ओर उष्ण दुःखद है; शिशिरकाल
में उष्ण सुखद और शीत दुःखद है; इसलिए विषय कभी सुख-दुःखरूप नहीं हो सकते । इसी तरह
'तितिक्षस्व' यह शब्द वैराग्य का भी उपलक्षण है। इससे निष्कर्ष यही निकला कि प्रिय विषयों से
विरक्त हो जाओ और अप्रिय विषयों को सहो ।)
जिस बुद्धि से वैराग्य और तितिक्षा - ये दोनों सिद्ध होते है, उसे कहते हैं।
इन्द्र्यो, इन्द्रियो का विषयसंसर्ग, सुख -दुःख आदि द्रनद्र या इनसे भिन्न जो कुछ भी हैं वे सबके
सब अद्रय, पूर्णानन्दस्वभाव स्वात्मा से तनिक भी पृथक् नहीं हँ । अतः उस प्रकार के सर्वत्र आत्मदर्शन
से कहाँ सुख और कहाँ दुःख होगा ? (प्रियतम धन आदि सम्पत्ति से मैं परिपूर्ण हूँ” इस भान्ति से
आभिमानिक सुख ओर उसके वियोग में या अप्रिय वस्तु की प्राप्ति में मैः खण्डित हआ“ इस भान्ति
से दुःख हो सकता है, परंतु वह भी निरवयव आत्मा मेँ पूरण ओर खण्डन का असंभव ज्ञात होने पर
निवृत्त हो जाता है, यह कहते हैं ॥) आदि-अन्त से शून्य तथा अवयवरहित स्वात्मा में पूरण ओर
खण्डन कैसे हो सकता है ?