Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

संस्थिता स्पर्शमात्राख्या मात्रास्पर्शभ्रमात्मकः । समदुःखसुखो धीरः सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस महामति की विषयों ओर इन्द्रियो मे सत्यता-भ्रान्ति उपशान्त हो जाती है, वह इन्द्रियविषय भ्रमात्मक जीव तत्त्वदर्शी ओर तुल्य सुखदुःख होकर अमृतपद के लिए योग्य हो जाता है