Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
नानातामलमुत्सृज्य परमात्मैकतां गतः ।
कुर्वन्कार्यमकार्यं च नैव कर्ता त्वमर्जुन ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे अर्जुन, अनेकतारूपी मल का उत्सर्ग करके परमात्मा के साथ
एकत्व प्राप्त कर तुम कार्य या अकार्य का (प्रमाद से निषिद्ध कर्मो का) सम्पादन कर रहे भी किसी
के कर्ता नहीं होओगो