Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे यह सिद्ध हुआ कि सम्पूर्ण इन्द्रियों का निग्रह कर चुके संन्यासी को ही, सम्पूर्ण इच्छाओं के
शान्त हो जाने से, परमपुरुषार्थ (मोक्ष) प्राप्त होता है, दूसरे को नहीं यो उपसंहार करते है ।
जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में प्रविष्ट हो जाती हैं यानी समुद्रभाव प्राप्तकर उसी में विलीन हो
जाती हैं, उसी प्रकार अचल ब्रह्म में प्रतिष्ठित हुए जिस संन्यासी मे सब कामनाएँ मिथ्यात्ववुद्धि से
बाधितविषय होती हुई प्रविष्ट हो जाती हैं यानी आत्मा में ही विलीन होकर एकमात्र आत्मरूपता को
प्राप्त हो जाती हैं; वही सम्पूर्ण अनर्थो की शांतिरूप मोक्ष प्राप्त करता है, न कि विषयों की कामना
करनेवाला पुरुष यह भाव है