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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । न कुर्याद्भोगसंत्यागं न कुर्याद्भोगभावनम् । स्थातव्यं सुसमेनैव यथाप्राप्तानुवर्तिना ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान ने कहा : हे पार्थ, बुद्धिमान्‌ देहधारण के निमित्तभूत अन्नपानादिरूप भोगों का त्याग न करे और न करे भोगो की प्राप्ति के लिए चिन्ता यानी भोगसौन्दर्य-सम्पादन के लिए व्यसनिता । यथाप्राप्त भोगों का उपभोग करते हुए समभाव से स्थित रहे उनकी प्राप्ति और अप्राप्ति में एक भाव से स्थित रहे

सर्ग सन्दर्भ

चौवनवाँ सर्ग समाप्त प्रचपनवाँ सर्ग देह का नाश हो जाने पर भी अविनाशी आत्मा मूढ़ और तत्त्वज्ञ दोनों में समान है, परन्तु भ्रान्ति से मूढ़ जन्मादि का भागी बनता है और तत्त्वज्ञानी नहीं बनता - यह वर्णन ।