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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

अनात्मन्यात्मतां देहे मा भावय भवात्मनि । आत्मन्येवात्मतां सत्ये भावयाऽभवरूपिणि ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह देहात्मभावना (देह में आत्मा की भावना ) भी न करे, यह कहते हैं। हे अर्जुन, जन्मादिविकारस्वभाव अनात्मरूप देह मे आत्मता की भावना मत करो, परन्तु जन्मादिविक्रियाशून्यस्वभाव सत्य आत्मा में ही आत्मा की भावना करो