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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । नास्त्येव सुखदुःखादि परमात्मास्ति सर्वगः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

असत्‌ भी सुख. दुःख आदि आत्मा में उत्पन्न होते है, क्योकि असत्‌ का अपने कारण में समवाय, अपनी सत्ता का सम्बन्ध अथवा आद्यक्षणसम्बन्ध ही उत्पत्ति पदार्थ है, इस तरह की कणादोक्ति (कणाद मुनि के मत) का खण्डन करते है। दुःख आदि असत्‌ पदार्थो की सत्ता नहीं रहती ओर आत्मरूप अबाधित सत्‌-वस्तु की असत्ता नहीं रहती । सत्‌ ओर असत्‌ वस्तुओं का यही स्वभाव है, विपरीत नहीं; यह वाचारम्भणश्रुति से निश्चित ह । इस विषय मेँ यदि यह शंका हो कि सब विकार असद्रूप होगे तो पिण्ड आदि में से किसी एक विकार से अस्पृष्ट मृत्तिकारूप प्रकृति के न दीख पड़ने के कारण उसे भी असद्रूप मानेंगे तो परिशेष में शून्यतापत्ति हो जायेगी, तो यह शंका युक्त नहीं है । क्योकि विकारों में अनुगत सद्बुद्धि निर्विषयक न हो सकने के कारण स्वतः विकारों के असत्त्व में भी परिशेष में शून्यता नहीं हो सकती | यदि अनुगत वस्तु असत्‌ होती तो “घटः असन्‌ यों घटादि में असत्‌ की अनुवृत्ति होती; परंतु वह "घटः सन्‌" यों सद्रूप से अनुवृत्त होती हे । इसलिये सन्मात्र ही परिशेष में रहता है । जो विषयों में सद्‌अभिमान होता है, वह अधिष्ठान सत्ता को लेकर ही होता है, स्वतः नहीं; अतः दुःख आदि की सत्ता नहीं है ओर व्यापक परमात्मा की ही सत्ता हे