Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
इदं नष्टमिदं युक्तमिति मोहभ्रमादृते ।
अन्यत्तथा न पश्यामि वन्ध्यास्त्रीतनयं यथा ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तव मूर्खो को देहनाश, पुत्रलाभ आदि में अनर्थत्व और अर्थत्व का व्यवहार कैसे होता है ? इस पर
कहते हैं।
यह नष्ट हुआ और यह प्राप्त हुआ, इत्यादि मूढ़-व्यवहारों को मे असत् मोहभ्रम के सिवा सद्रूप
उस प्रकार नहीं देखता, जिस प्रकार असत् वन्ध्या स्त्री के पुत्र को । निष्कर्ष यह निकला कि स्वप्न में भी
पुत्रमरण ओर पुत्रजन्म के भ्रम से अनर्थत्व और अर्थत्व व्यवहार जैसे देखा जाता है, वैसे ही मूढ़ों को भी
भ्रम से व्यवहार होता है